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पेप्सिको केस से कृषि क्षेत्र के एक और संकट की आहट

बिश्वजीत धर - MAY 02 , 2019
पेप्सिको केस से कृषि क्षेत्र के एक और संकट की आहट

खुद को स्नैक्स बनाने वाली कंपनी कहने वाली पेप्सिको इंडिया ने गुजरात के चार किसानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है। उसने प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट (पीपीवीएफआरए) के तहत कानूनी कार्रवाई की है। कंपनी ने दो हाईब्रिड आलू वैरायटी एफएल 1867 और एफएल 2027 के पंजीकरण के लिए फरवरी 2011 में आवेदन किया था। उसे पीपीवीएफआरए के तहत इन दोनों किस्मों का 15 साल के लिए पंजीकरण फरवरी 2016 में मिला। पेप्सिको ने एफएल 2027 की मार्केटिंग एफसी-5 ट्रेडमार्क के तहत शुरू की। इसके लिए ही उसने दावा किया है कि गुजरात के किसान अवैध रूप से इस वैरायटी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस मामले ने पीपीवीएफआरए से जुड़े कई मसले उभार दिए हैं। ये मसले इस कानून के कुछ विवादित प्रावधानों से लेकर इसे लागू करने के तरीके तक से जुड़े हैं। अगर कानून की मूल भावना को बनाए रखने के लिए इन मुद्दों को सुलझाया नहीं गया तो भारतीय कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूद संकट आने वाले समय में और गंभीर हो जाएगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस कानून का किसानों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

1995 में भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल हुआ और ट्रेड रिलेटेड आस्पेक्ट्स ऑफ इंटेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (ट्रिप्स) के समझौते को लागू करने के लिए सहमति जताई। इसके बाद कृषि क्षेत्र में बौद्धिक संपदा अधिकारों को लागू करने पर विस्तृत विचार विमर्श के बाद पीपीवीएफआरए 2001 में पारित किया गया था। भारत को किसानों के हितों की रक्षा के लिए कानून बनाने और इंटरनेशनल यूनियन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ न्यू प्लांट वैरायटीज (यूपीओवी) में से किसी एक का चयन करना था। दूसरा विकल्प खारिज कर दिया गया क्योंकि यूपीओवी के 1991 में अपनाए गए वर्जन (यूपीओवी 91) में किसानों को अपनी बची उपज को बीज के रूप में इस्तेमाल करने और पड़ोसी किसानों के साथ अदला-बदली करने की आजादी से वंचित कर दिया गया था। इस वजह से भारत ने पीपीवीएफआरए में किसानों के अधिकारों के लिए एक नया चैप्टर जोड़ा जिसमें किसानों को अपनी उपज बचाकर रखने, इस्तेमाल करने, बुवाई करने, दोबारा बुवाई करने, अदला-बदली करने और बेचने की अनुमति दी गई। इस एक्ट के लागू होने से पहले की तरह किसानों को संरक्षित किस्मों की उपजों पर भी ये सभी अधिकार दिए गए।

किसानों के खिलाफ पेप्सिको के मुकदमे ने कई अहम मुद्दे उठा दिए हैं जिन पर अभी तक अदालत में गौर नहीं किया गया है। पहला अहम मुद्दा है कि किसानों द्वारा पंजीकृत वैरायटी का उत्पादन अपराध नहीं है क्योंकि किसानों को ऐसी वैरायटी के दोबारा इस्तेमाल करने और पड़ोसी किसानों से बदलने का पूरा अधिकार है। कंपनी ने अदालत में दावा किया है कि एफसी-5 वैरायटी उगाने का लाइसेंस पहले पंजाब में किसानों को दिया गया ताकि वह आलू उगवाकर उनसे वापस खरीद सके। कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पंजाब के अलावा और किन राज्यों में एफसी-5 वैरायटी उपलब्ध कराई गई।

दूसरा अहम मसला है कि एफसी-5 “मौजूदा वैरायटी” के रूप में पंजीकृत है जो सामान्य प्रचलन की वैरायटी भी है। दूसरे शब्दों में, यह वैरायटी इसके पंजीकरण से पहले देश में उपलब्ध थी। देश में यह वैरायटी सामान्य रूप से ज्ञात थी। ऐसे में माना जा सकता है कि पेप्सिको की यह वैरायटी निश्चित ही उसके पंजीकरण के पहले से उगाई जाती रही होगी। इसके अतिरिक्त, पेप्सिको इंडिया होल्डिंग बनाम बिपिन पटेल मामले में न्यायाधीश के आठ अप्रैल 2019 के आदेश से पता चलता है कि कंपनी ने संभवतः सही जानकारी नहीं दी कि एफसी-5 नई वैरायटी के बजाय प्रचलित वैरायटी है।

अनेक विशेषज्ञों के विरोध के बावजूद पीपीवीएफआर में प्रचलित वैरायटी के पंजीकरण की अनुमति दी गई थी। इसके पीछे तर्क दिया गया कि किसानों की भी किस्मों का पंजीकरण किया जा सकेगा। इससे किसानों को क्या फायदा होगा, यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन यह अवश्य समझा जा सकता है कि पेप्सिको जैसी कंपनियां अवसर पाकर अपनी पुरानी किस्मों का पंजीकरण करवा सकेंगी और प्रचलित एवं ज्ञात किस्मों के इस्तेमाल के लिए किसानों पर मुकदमा कर सकती हैं।

दूसरा मसला उस चाल से जुड़ा है कि जिसके तहत पेप्सिको ने किसानों को मुश्किल डाल दिया। खबर है कि कंपनी ने किसानों के खेतों के सैंपल हासिल करने के लिए प्राइवेट जासूस लगाए। जासूसी का यह तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसा मोनसेंटो ने किया था। उसने कनाडा के एक किसान पर्सी श्माइजर के यहां छापे मारे और दावा किया कि किसान अवैध रूप से जीएम कनोला का उत्पादन कर रहा था। पर्सी बीजों का कारोबार करने वाली कंपिनयों के खिलाफ विश्वव्यापी किसान आंदोलन के अगुआ बन गए। इस आंदोलन के कारण ही मोनसेंटो पर्सी से कोई मुआवजा वसूल नहीं कर पाई।

प्रतीत होता है कि पेप्सिको को अहसास हो गया है कि उसने सीमा पार कर ली है। अब कंपनी ने इन किसानों को विवाद खत्म करने के लिए उससे बीज खरीदने का समझौता करने का प्रस्ताव दिया है। प्रस्ताव है कि किसान पेप्सिको की शर्तों पर उत्पादन करके बिक्री कर सकेंगे। इस मामले का कुछ भी नतीजा निकले लेकिन इससे यह तथ्य उभर चुका है कि पेप्सिको जैसी बड़ी कंपनियां कैसे गरीब किसानों की कीमत पर अपना मकसद पाने के लिए कानून का इस्तेमाल करती हैं।

(लेखक सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंट प्लानिंग, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली के प्रोफेसर हैं। व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।)

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