Home रूबरू सामान्य “तिवारी और शीला दीक्षित नहीं हैं रेस में, आप उम्मीदवार दिलीप पांडे को इसलिए है जीत का भरोसा”

“तिवारी और शीला दीक्षित नहीं हैं रेस में, आप उम्मीदवार दिलीप पांडे को इसलिए है जीत का भरोसा”

चंदन कुमार - MAY 04 , 2019
“तिवारी और शीला दीक्षित नहीं हैं रेस में, आप उम्मीदवार दिलीप पांडे को इसलिए है जीत का भरोसा”

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों के लिए 12 मई को चुनाव होना है। इन सातों में सबसे हॉट सीट मानी जाने वाली उत्तर-पूर्वी दिल्ली से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा सांसद मनोज तिवारी, कांग्रेस  से पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और आम आदमी पार्टी से दिलीप पांडे मैदान में हैं। चंदन कुमार ने दिलीप पांडे से उनके चुनावी गुना-गणित और समीकरण पर बात की। मुख्य अंशः

चुनावों में आपका मुद्दा क्या है?

उत्तर-पूर्वी लोकसभा में हम जहां बैठे हैं, वह यमुना पार इलाका है। विकास और तरक्की के मामले में यह पिछड़ा इलाका है, जिससे यहां के लोग परेशान हैं। यहां की जनता ने विकास के लिए बड़े-बड़े लोगों को सांसद बनाया। पिछली बार मुंबई से आए भोजपुरी फिल्मों के सितारे को सांसद बना दिया। लोगों ने इस उम्मीद में वोट किया कि बड़े-बड़े लोग आएंगे तो बड़े काम होंगे। अब उन्हें लग रहा है कि अपना दुख-दर्द दूर करना है, तो ऐसा आदमी चुनना होगा, जो हमारी समस्या को समझता हो। मतलब यह कि जो वजीराबाद के जाम में फंसा ही नहीं, तो उसे इसकी अहमियत क्या पता होगी। जो शास्त्री पार्क के जाम में नहीं फंसा, जिसने सीलमपुर का जाम नहीं देखा या जिसने करावल नगर वाली सड़क पर धूल नहीं फांकी, वह यहां की तकलीफों को दूर नहीं कर सकता। लिहाजा यहां के लोग अब बना चुके हैं कि बड़ा नहीं अपना आदमी चाहिए।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली क्षेत्र की मुख्य समस्याएं क्या हैं और आपके हिसाब से उनका समाधान क्या है?

आजादी के 70 साल बाद भी अगर आज यहां से कोई दूसरे इलाके जैसे क्नाट प्लेस, कश्मीरी गेट या चांदनी चौक जाता है और लोग पूछते हैं कि कहां जा रहे हो, तो कहते हैं कि दिल्ली जा रहे हैं। मतलब साफ है कि आजादी के 70 साल गुजर गए, लेकिन यह इलाका दिल्ली भी नहीं बन पाया। मेरा संकल्प यह है कि जर्मनी, जापान, हांगकांग, सिंगापुर बने-न-बने लेकिन विकास के मामले में इस इलाके को दिल्ली के बाकी के इलाके के बराबर जरूर खड़ा करूंगा। लोगों की समस्या समझिए कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली के लोग यह नहीं कह रहे कि उनका इलाका पेरिस बन जाए, लेकिन कम-से-कम पहले दिल्ली तो बने। मैंने लोगों से पूछा कि दिल्ली से क्या मतलब? तो उनका कहना है कि थोड़ा साफ-सुथरा हो जाएगा, सड़कें चौड़ी हो जाएंगी, फ्लाईओवर बन जाएंगी, तिवारी जी कूड़े का पहाड़ बना रहे थे, उसकी जगह खेल का मैदान बन जाएगा। यहां दो ही अस्पताल जग प्रवेश और जीटीबी पूरे इलाके को कवर कर रहे हैं। कॉलेज वही हैं श्यामलाल और आंबेडकर कॉलेज। और कॉलेज खुलने चाहिए।

पिछले चार साल से आप की सरकार है, तो ये काम क्यों नहीं हुए?

नहीं, यह हो ही नहीं सकता था। साफ-सफाई हम कैसे करेंगे, हमारे पास निगम नहीं है। डीएमसी एक्ट-1957 क्लॉज तीसरा सेक्शन कहता है कि अगर पूरी दिल्ली में तिनके का भी पत्ता है, तो उसे उठाने की जिम्मेदारी निगम की है। तो हम चाहकर भी सफाई नहीं कर सकते। अब मैं कहूं कि एक स्टेडियम बनाना चाहता हूं तो इसके लिए जमीन कहां से आएगी, डीडीए से। डीडीए केंद्र सरकार के पास है। अगर मैं सांसद बनता हूं तो डीडीए का मेंबर बनूंगा, तो फिर मैं जमीन उपलब्ध कराने की कोशिश कर सकता हूं। मुझे अस्पताल, बस स्टेडियम, पार्क बनाने हैं तो मुझे लगता है कि अगर सात सांसद जीतते हैं, तो ये सब काम कराना आसान होगा।    

आपके सामने शीला दीक्षित और मनोज तिवारी जैसे दिग्गज हैं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती किसे मानते हैं?

ईमानदारी से कहूं तो दोनों बड़े नाम हैं। इनके सामने मैं बेहद सामान्य-सा हूं। एक तीन बार की मुख्मंत्री हैं, तो दूसरा बड़ा फिल्मी कलाकार है। मौजूदा माननीय सांसद और मुझमें अंतर है कि वे नाच-गा सकते हैं और मैं काम करा सकता हूं। वे फुलटाइम सेलेब्रिटी और पार्टटाइम राजनीति में हैं। मैं फुलटाइम राजनीति में हूं और पार्टटाइम मेरा कुछ नहीं है। मतलब सियासत मेरी जिंदगी है। उनमें गुरूर और अहंकार है। उनकी पार्टी के कार्यकर्ता नाराज हैं और उन्हें हराना चाहते हैं। उनका कहना है एक सीट मोदी जी नहीं भी जीतेंगे तो फर्क नहीं पड़ेगा। कहीं और जीत लेंगे।

वहीं, शीला दीक्षित 83 साल की हैं और मैं 38 साल का। उम्र के लिहाज से वे मेरी दादी मां की तरह हैं। मैं अधिक-से-अधिक यही कहूंगा उनकी लंबी उम्र और अच्छी सेहत की प्रार्थना करता हूं। यही दुआ इलाके की जनता कर रही है, लेकिन वोट देने के लिए राजी नहीं है। उसकी अपनी वजह है। लोगों को कहना है कि इन्होंने ही गठबंधन नहीं होने दिया। इनको तो सबक सिखाएंगे।  

पूर्ण राज्य का दर्जा की मांग दिल्ली के विकास से कैसे जुड़ा है। मान लीजिए आपके सातों उम्मीदवार जीत जाते हैं, तो क्या पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाएगा?

हमारा मानना है कि भाजपा की बहुमत वाली सरकार नहीं बन रही है। गठबंधन की सरकार बन सकती है। गठबंधन की सरकार में सात सांसदों के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाइए कि आज एक सांसद वाली पार्टी का नेता भी केंद्र में मंत्री है। अगर हमारे सात सांसद होंगे, तो बहुत ताकत होगी। हमारा कहना है कि कोई भी गैर-भाजपाई सरकार हो, हमें मंत्रालय नहीं चाहिए। हमारे सातों सांसदों का समर्थन का होगा, अगर पूर्ण राज्य के दर्जे पर सहमत हो जाए।  

कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने की स्थिति में किस तरह का नुकसान हो सकता है?

कोई नुकसान नहीं होगा। लोग कांग्रेस को क्यों वोट करेंगे। जो फिल्म सिनेमा हॉल से उतर गई, उसका टिकट कोई खरीदता है क्या। कांग्रेस वही सिनेमा है, जो हॉल से उतर गई है। अब कोई उसका टिकट खरीदने वाला नहीं है। अगर हम मान रहे हैं कि भाजपा को रोकना है, तो पश्चिम बंगाल में कौन रोकेगा ममता बनर्जी, राजस्थान में कांग्रेस रोकेगी, मध्य प्रदेश में कांग्रेस रोकेगी। दिल्ली में कौन रोकेगा, हम रोकेंगे। जिन राज्यों के नाम गिनाए, वहां हम चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वहां हम लड़ते तो भाजपा को मजबूत करते। दिल्ली में वहीं काम कांग्रेस कर रही है। यह कांग्रेस नहीं समझ रही है।

मनोज तिवारी का कहना है कि विधानसभा में 67 सीटों वाली पार्टी शून्य सीटों वाली पार्टी से गठबंधन करना चाहती थी। यह उनकी हताशा है।

समाजवादी पार्टी से टिकट लेकर बुरी तरह चुनाव हारे हुए नेता जी अगर शुचिता की राजनीति की बात करते हैं, तो ऐसा लगता है कि गब्बर सिंह अहिंसा पर प्रवचन दे रहा है। इस तरह की बातें उनको शोभा नहीं देती है। वह सपा से बुरी तरह हारे और भाजपा के नेताओं को भला-बुरा सुनाया। जिन मुद्दों पर भाजपा नेताओं की आलोचना की, उन्हीं मुद्दों पर आज चुप्पी साधे बैठे हैं।

जातीय समीकरण के लिहाज से पूर्वांचली वोटर्स यहां काफी प्रभावी है। मौजूदा सांसद मनोज तिवारी भी इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। इसका आपको कितना खामियाजा उठाना पड़ सकता है।

मौजूदा माननीय सांसद कहते हैं कि देखो मैं तो पूर्वांचली हूं और तिवारी हूं। तो पांच लाख एक जेब और डेढ़ लाख वोटर दूसरी जेब में लेकर घूमता हूं। वे लोकतंत्र के मालिक यानी मतदाता को जेब में लेकर घूमते हैं। मैं डेढ़ साल से गली-गली में जाकर हाथ जोड़कर लोगों से आशीर्वाद मांग रहा हूं। लोगों किसे वोट करेंगे जो मतदाता को जेब में रखकर घूमता हो या गली-गली जाकर उनका आशीर्वाद लेता है। सांसद महोदय जिस पूर्वांचल की राजनीति का दंभ भर रहे हैं, उसी समाज के लोगों ने उन्हें सबक सिखाना शुरू कर दिया है। दिल्ली में पूर्वांचल से किसी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष कौन था?  आम आदमी पार्टी का था। मैं यानी दिलीप पांडे था। उसके बाद तिवारी भाजपा का बने हैं।     

भाजपा मोदी के नाम पर वोट मांग रही है। इस फैक्टर से कैसे निपटेंगे। आपकी क्या रणनीति है।

नाम को वोट नहीं मिलेगा। ऐसा अभी है, लेकिन धीरे-धीरे कम होगा। लोग नाम को वोट करते-करते उब चुके हैं। अब काम को वोट करना चाहते हैं। तिवारी जी अपने नहीं मोदी जी के नाम पर वोट मांगते हैं। हमारे लोग वोट मांगने जाते हैं तो कहते हैं कि स्कूल अच्छे किए वोट दे दो, अस्पताल ठीक किए वोद दे दो। पानी-बिजली ठीक किए वोट दे दो। तो इस बार दिल्ली में लोग किसी भी बड़े नाम नहीं, बल्कि काम पर वोट करेंगे।

आपको अपनी जीत का भरोसा क्यों है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली की जनता आपको क्यों वोट दे?

यह लड़ाई मेरी नहीं है। मैं आश्वस्त हूं कि जनता ने इस लड़ाई को अपने हाथों में ले लिया है। सभाओं और रैलियों में हजारों लोग बिना बुलाए आ जा रहे हैं। मुझे लगता है कि यह लड़ाई जनता बनाम उन तमाम लोगों के बीच की है, जिन लोगों ने जनता को हर मुद्दे और अवसर पर धोखा दिया। जब लड़ाई जनता बनाम बड़े लोग और आम आदमी बनाम बड़े लोगों की होती है, जीत आम आदमी और जनता की होती है।

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